चलने की बीमारी जहा पैर थके ना हो और जिंदगी थक जाये!
The best way to get rid off
arguing with ourself - engage your mind in new activity you have never done
before!
Today I Started writing blog just to avoid arguing with my self! This is my first blog,
ऐसी ही एक बीमारी है जो हम सब की जिन्दगी में कभी कभी आती है, और हमें ही नहीं पता होता है की ये एक बीमारी है! न इसके लिए कोई डॉक्टर है न कोई दवाई!
ये एक ऐसा समय होता है जब
किसी भी चीज़ में मन नहीं लगता, चाहे वो job हो या फिर घर! TV हो या रोजबरोज के दोस्त! ऐसा लगता है की सब कुछ चल
रहा है पर एक मशीन की तरह न की उसे महसूस करके! क्या पता ये बीमारी भी जिंदगी जीने का
या जिन्दगी में कुछ सिखने की या खुद की परीक्षा लेने का तरीका हो! आज की ये भाग
दौड़ वाली जिन्दगी में ये परीक्षा और ऐसी बीमारी होना काफी लोगो में सामान्य हो सकता
है! किसी और से लड़ लेना, बहेस कर लेना बहुत आसान होता है पर खुद से लड़ना या खुद से
बहस करना सबसे मुश्किल होता है! जिन्दगी में कभी हम मा/बाप/भाई/बहन/दोस्त/बीवी से
पक जाते है भले ही कुछ दिन या कुछ समय के लिए पैर वो तो फिर भी अच्छी बात है हम उन पर गुस्सा करके या उनसे बात न करके संतुष्ट हो जाते है! पर जब हम खुद से पक
जाते है तब होती ये बीमारी - चलने की बीमारी जिसमे पैर न थके हो और जिंदगी थक
जाये!
हाँ दोस्तों हमारे पास
दूसरो से पक जाने के बहुत कारन होते है पर हम खुद से भी पक जाते है कभी कभी और
उसकी वजह ज्यादातर हमें या तो पता नहीं होता या हम पता नहीं करना चाहते है! कोई भी सम्बन्ध में टकराव, बहस बहुत सामान्य बाबत है, ऐसी ही यहाँ पे हमारा खुद का अपने से भी तो एक सम्बन्ध होता है तो हमे अपने आपसे भी तो रूठने का हक़ है! और ये वही हालत है, पर दूसरी तरफ दुःख ये है की जब हमारी प्रॉब्लम हम खुद ही है तो ऐसे माहोल में क्या करे, कैसे खुद पे चिल्लाये? कैसे खुद को ही कोसे? मुश्किल है बहुत मुश्किल!
हाथ, पैर, बाकि अंग थक सकते है तो कभी कभी जिंदगी भी तो थक सकती हे? ऐसा क्या बुरा कर दिया जिंदगी ने? आख़िर स्वतंत्र भारत की स्वंतंत्र जिंदगी है! फ़र्क सिर्फ इतना है की इसके लिए कोई बाम या दवाई नहीं है!
मेरा अपना अनुभव ये कहता है की मुझे ऐसी बीमारी तब होती है जब में हद से ज्यादा अपने आप से दूर हो जाऊ, कोई काम में उतना व्यस्त हो जाऊ की अपने आप को समय दे नहीं पाऊं! जब हम खुद से बात करना बंद करदे तो खुद का खुद से रूठना वाजिब है! जैसे हमें हमारे घरवाले, दोस्तों से expectation होती है वैसे ही हमें खुद को भी अपने आप से भी बहुत expectation होते है!
अब बीमारी और बहुद हद तक उनके कारन समज में तो आ गए पर इस खुद की नाराजगी से कैसे बचे या कैसे बाहर आये? ज्यादा उम्मीद मत रखिये की में आपको कोई दवा या रास्ता दिखादु मेने पहले ही बताया इसका वैसे तो न कोई इलाज है न कोई डॉक्टर!
कुछ नुस्खे है पर बहुत कम उमीद है की ये नुस्खे सब के लिए काम आये, क्यूँ की सब की खुदकी नाराजगी का कारन अलग हो सकते है!
जैसी ही ये बीमारी की भनक लगे की थोडा अँधेरा करके, अपने आप से बाते करे, समजे की में खुद से क्यूँ पक गया हूँ? रोजबरोज के काम से? रोजबरोज की बातो से? ऐसी कोई नयी ख्वाइश जो कबसे डिमांड की हो और आप सुन नहीं रहे हो! ज्यादातर ऐसी बातो से कभी कभी रूठने की वजह का जवाब मिल जाता है!
कभी कभी इसका इलाज कोई शांत नदी, पर्वत, कोई कुदरती सौन्दर्य जैसी जगह पे खुद के साथ कुछ समय बिताने से भी अच्छा महसूस कर सकते है!
कभी कोई अपने सही में बहुत क्लोज़ दोस्त होता है उसके कंधो पे सर रखके रोने से भी अच्छा महसूस हो सकता है, जरुरी नहीं है की रोने की कोई वजह हो! हालाँकि आज की फ़ास्ट लाइफ में ऐसे कंधे गायब से हो गए है, और रोना चाहो तो भी कोई वो रोने का माहोल भी नहीं है, हाँ रोने के लिए भी माहोल चाहिए!
दोस्तों से गुजारिश है की ऐसे माहोल में शराब या नशे का सहारा न ले, नशे से आप ये कह सकते हो की मेरा खुद से कोई वास्ता नहीं और नाही में खुद को मनाने की कोशी करूंगा जो की सही एप्रोच नहीं हो सकता! अपने आप से सुलह जरुरी है ताकि ये बीमारी से आप जल्द बाहर आ जाओ!
लड़ाइ चाहे कितनी भी लम्बी हो या कठिन क्यू न हो, कोई लड़ाई छोडके भाग जाना एक कायर की निशानी होती है, जब आपको खुद को मनाने की हिम्मत या skill नहीं हो तो आप दूसरो को तो कैसे मना पाओगे जिंदगी में ? इसलिए कोई कभी ऐसी लड़ाई के समय में खुद को लड़ाई से भागने का या उसका कोई shortcut निकालने की कोशिश गलती से भी ना करे!
मुझे उमीद है की मेरे दोस्त और ये ब्लॉग पढने वाले साथी जिंदगी की ऐसी खुद के साथ लड़ाई हो तो ये पढ़े और हो सके तो इसमें कुछ नुस्के कोशिश करे और नए नुस्खे शेयर भी करे!
जिंदगी को समजने की एक और कोशिश!
भूषण भट्ट
14 March 2014
1AM